उन पांच समस्याओं पर विवेकानंद क्या सोचते थे जो आज भी देश की राह का सबसे बड़ा रोड़ा हैं

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था, 'यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानंद को पढ़िये.'


कुछ साल पहले की बात है. एक चर्चित साप्ताहिक पत्रिका ने स्वामी विवेकानंद पर विशेषांक निकाला था. इसमें छपे अपने लेख में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के शब्द थे, 'हमारे जीवन में स्वामी विवेकानंद एक ऐसे तारे के रूप में हैं जो ज्ञान और उम्मीदों से भरा है. उन्होंने यह साबित किया है कि बगैर देह के भी वे हर जगह के लोगों को हर वक्त प्रेरित करते रहेंगे. आइए हम सब मिलकर उनके बताए रास्ते पर आगे बढ़ें.'


विवेकानंद से प्रेरणा लेने की बात कहने वाले प्रणव मुखर्जी अकेले नहीं हैं. वक्त में पीछे जाएं तो हस्तियों की यह लंबी सूची जवाहर लाल नेहरू और महात्मा गांधी तक जाती है. 12 जनवरी 1863 को बंगाल में जन्मे नरेंद्रनाथ दत्त बाद में रामकृष्ण परमहंस के शिष्य बने और फिर 25 साल की उम्र में ही गेरुआ पहनकर स्वामी विवेकानंद हो गए. 1893 में शिकागो में हुई धर्म संसद में उनके भाषण ने उनकी ख्याति को आसमान पर पहुंचा दिया.


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था, 'यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानंद को पढ़िये.' लेकिन यह सिर्फ जानने भर की बात नहीं है. कई लोग हैं जो मानते हैं कि इस देश की समस्याओं के लिहाज से भी विवेकानंद के विचार उनके जाने के एक सदी बाद भी प्रासंगिक बने हुए हैं- न सिर्फ भारत के नीति निर्धारकों के लिए बल्कि विकास की पश्चिमी अवधारणा का अंधानुकरण करते उसके समाज के लिए भी.


गरीबी


देश में गरीबी कितनी है, इस बारे में सबसे चर्चित आंकड़ा अर्जुन सेनगुप्ता की अगुवाई वाली एक समिति का है. इस समिति ने कुछ साल पहले यह अनुमान लगाया था कि देश की 77 फीसदी आबादी रोजाना 20 रुपये से कम पर गुजर बसर करने को मजबूर है.गरीब और गरीबी को लेकर किस तरह का रवैया अपनाया जाना चाहिए, यह बताते हुए विवेकानंद कहते हैं, 'हर व्यक्ति को भगवान की तरह देखो. आप किसी की मदद नहीं कर सकते, बस उसकी सेवा कर सकते हैं. अगर आपके पास अधिकार हैं तो यह समझें कि भगवान के बच्चों की सेवा खुद उसकी ही सेवा है. गरीबों की सेवा का काम पूजा भाव से करो.' वे आगे कहते हैं, 'जब तक करोड़ों लोग भूखे और वंचित रहेंगे तब तक मैं हर उस आदमी को गद्दार मानूंगा जिसने गरीबों की कीमत पर शिक्षा तो हासिल की लेकिन, उनकी चिंता बिल्कुल नहीं की.'


विवेकानंद की इन दो बातों से साफ है कि वे इस बड़ी समस्या का समाधान गरीबों के लेकर रवैये में बदलाव' के रूप में दे रहे हैं. एक बड़ा वर्ग मानता है कि आज अगर देश के नीति निर्धारक गरीबों को लेकर सिर्फ अपना रवैया बदल लें तो फिर जो नीतियां बनेंगी, वे असल मायनों में गरीबपरस्त होंगी.


खेती


भले ही देश की 70 फीसदी आबादी अब भी गुजर-बसर के लिए कृषि पर निर्भर हो लेकिन किसान और किसानी की दुर्दशा किसी से छिपी हुई नहीं है. कहने को तो सरकार हर साल बजट में किसानों के कल्याण के लिए लंबे-चौड़े वादे करती है. लेकिन बड़ी-बडी योजनाओं और कर्ज माफी की घोषणाओं होने के बावजूद नियमित अंतराल पर आने वाली किसानों की आत्महत्या की खबरें बताती हैं कि जमीनी हाल एक बड़ी हद तक जस का तस है.


किसान और किसानी की समस्याओं के समाधान के बारे में स्वामी विवेकानंद कहते हैं, 'किसानों की समस्या का समाधान शिक्षा के जरिए किया जा सकता है. भारत अब भी ज्ञान के सीमित प्रसार की राह पर चल रहा है. शिक्षा को मुट्ठी भर लोगों की जागीर बनाने से काम नहीं चलेगा. एक बार ब्रिटेन में यह चर्चा गर्म हुई कि वहां के मजदूर काफी मजदूरी ले रहे हैं और जर्मनी के मजदूर सस्ते हैं. इसके बाद ब्रिटेन ने एक आयोग जर्मनी भेजा. इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि जर्मनी के मजदूर अधिक मजदूरी ले रहे हैं. आयोग ने इसकी वजह शिक्षा को बताया. भारत में जोर शिक्षा के प्रसार पर नहीं बल्कि इसे खुद तक सीमित रखने पर है.'


शिक्षा


और वह शिक्षा कैसी हो, इसके बारे में स्वामी विवेकानंद कहते हैं, 'शिक्षा का मतलब यह नहीं है कि दिमाग में कई ऐसी सूचनाएं एकत्रित कर ली जाएं जिसका जीवन में कोई इस्तेमाल ही नहीं हो. हमारी शिक्षा जीवन निर्माण, व्यक्ति निर्माण और चरित्र निर्माण पर आधारित होनी चाहिए. ऐसी शिक्षा हासिल करने वाला व्यक्ति उस व्यक्ति से अधिक शिक्षित माना जाएगा जिसने पूरे पुस्तकालय को कंठस्थ कर लिया हो. अगर सूचनाएं ही शिक्षा होतीं तो फिर तो पुस्तकालय ही संत हो गए होते.' शिक्षा के महत्व को रेखांकित करते हुए वे आगे कहते हैं, 'यूरोप के कई शहरों की यात्रा करके मैंने यह देखा कि वहां के गरीब भी शिक्षित हैं और उनकी हालत हमारे यहां के गरीबों से बहुत अच्छी है. यह फर्क शिक्षा ने पैदा किया है. शिक्षा आत्मबल देती है.'


महिला सशक्तिकरण


राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की सालाना रिपोर्टों को उठाकर देखा जाए तो पता चलता है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में स्थिति कितनी विकराल है. सुरक्षा के अलावा महिलाएं और भी कई मोर्चों पर समस्याओं का सामना कर रही हैं. उनके सशक्तिकरण को लेकर तमाम सरकारी योजनाओं और सैकड़ों की संख्या में गैर सरकारी संगठनों की सक्रियता के बावजूद घर से लेकर शिक्षा और रोजगार सहित हर जगह उनसे दोयम दर्जे के नागरिक की तरह व्यवहार होता है. महिलाओं की समस्याओं के समाधान के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग है लेकिन, नख-दंतविहीन यह आयोग सिर्फ नुमाइशी बनकर रह गया है.


महिलाओं को सशक्त बनाने की राह सुझाते हुए स्वामी विवेकानंद कहते हैं, 'महिलाओं को बस शिक्षा दे दो. इसके बाद वे खुद बताएंगी उनके लिए किस तरह की सुधार जरूरत है. मामूली दिक्कतों में भी उन्हें अब तक असहाय बने रहने, दूसरों पर निर्भर रहने और आंसू बहाने का ही प्रशिक्षण दिया गया है.' महिला सशक्तिकरण को देश की प्रगति से जोड़ने की वकालत करते हुए वे कहते हैं, 'किसी भी देश की प्रगति का सबसे बेहतर पैमाना यह है कि वह देश अपनी महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार करता है. जब तक महिलाओं की स्थिति नहीं सुधरेगी तब तक इस दुनिया के कल्याण की कोई संभावना नहीं है. भारत में पुरुषों ने महिलाओं को उत्पादन मशीन बनाकर छोड़ा है. अगर महिलाओं को सशक्त नहीं बनाया गया तो फिर तरक्की का कोई रास्ता नहीं बचता.'


युवा सशक्तिकरण


देश की 51 फीसदी आबादी की उम्र 25 साल से कम है. इस आधार पर कहना गलत नहीं होगा कि देश की प्रगति काफी हद तक युवाओं पर निर्भर करती है. लेकिन क्या इस वर्ग को वे सुविधाएं मिल रही हैं जिसके आधार पर वह सशक्त बनकर देश की प्रगति में अपनी भूमिका निभा सके. युवाओं का एक बड़ा वर्ग उसी वंचित समुदाय से है जो अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने को लेकर संघर्ष कर रहा है. जो शिक्षित युवा है उसके बारे में कॉरपोरेट जगत की अक्सर शिकायत रहती है कि उसे जो शिक्षा मिली है उसमें गुणवत्ता का अभाव है. आपराधिक घटनाओं में युवाओं की बढ़ती संलिप्तता पर अक्सर चिंता जताई जाती है. कहा जा सकता है कि जिस वर्ग पर देश की तरक्की का सबसे अधिक भार है, वह आज कई समस्याओं का सामना कर रहा है.


युवाओं को राह दिखाते हुए स्वामी विवेकानंद कहते हैं, 'कोई भी समाज अपराधियों की सक्रियता की वजह से से गर्त में नहीं जाता बल्कि अच्छे लोगों की निष्क्रियता इसकी असली वजह है. इसलिए नायक बनो. हमेशा निडर रहो. यह डर ही है जो दुख लाता है और भय की वजह है अपने आसपास को नहीं समझना. कुछ प्रतिबद्ध लोग देश का जितना भला कर सकते हैं उतना भला कोई बड़ी भीड़ एक सदी में भी नहीं कर सकती. मेरे बच्चो, आग में कूदने के लिए तैयार रहो. भारत को सिर्फ उसके हजार नौजवानों का बलिदान चाहिए.'


युवाओं को सफलता का सूत्र देते हुए विवेकानंद कहते हैं, 'कोई एक विचार लो और उसे अपनी जिंदगी बना लो. उसी के बारे में सोचो और सपने में भी वही देखो. उस विचार को जियो. अपने शरीर के हर अंग को उस विचार से भर लो. सफलता का रास्ता यही है. जब तुम कोई काम कर रहे हो तो फिर किसी और चीज के बारे में मत सोचो. इसे पूजा की तरह करो. इस दुनिया में आए हो तो अपनी छाप छोड़कर जाओ. ऐसा नहीं किया तो फिर तुझमें और पेड़-पत्थरों में अंतर क्या रहा? वे भी पैदा होते हैं और नष्ट हो जाते हैं.'