प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कितना उचित है

 बिजली उत्पादन के लिए नदियों की अविरल धारा को रोक दिया गया है जिसके चलते हजारों दुर्लभ जल-जंतु अपना अस्तित्व खो बैठे हैं। करोड़ों हेक्टेयर भूमि के जंगल नष्ट हो गए हैं। पानी का व्यापार तेजी से बढ़ता जा रहा है और निश्चित ही एक दिन दूध से ज्यादा महंगा होगा पानी।



नदियों और समुद्र से लगातार बहुतायत में रेत निकाली जा रही है। गिट्टी और सिमेंट के लिए हजारों पहाड़ों को काट दिया गया है जिससे जहां हवाओं का रुख बदला है वहीं कई घने जंगल नष्ट हो गए हैं। इस सबका परिणामय यह हुआ कि अब आसमान में पक्षियों की चहचहाट सुनाई नहीं देती। 



 

मानव गतिविधियों के कारण ग्लोबल वॉर्मिंग के प्रभावों में तेजी से जलवायु परिवर्तन भी बदलने लगा है। अनेक पर्यावरणविदों व वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते हो रहा जलवायु परिवर्तन निकट भविष्य में कई प्रजातियों के विलुप्त होने का सबसे बड़ा कारण बन जाएगा। 



 

भारत के जानवर : भारत की धरती से लुप्त हो रहे हैं टाइगर, भालू, हाथी, घोड़े, गौरेया, गाय, गिद्ध, बाज, हंस, देशी कुत्ते और तमाम तरह के वे पशु और पक्षी जो सिर्फ भारत की धरती पर ही पाए जाते हैं। इसके अलावा दुर्लभ भारतीय पौधे, पेड़ और झाड़ियां भी लुप्त होते जा रहे हैं। किसी को इसकी चिंता नहीं है कि भारत की इन मूल संपदा को बचाया जाए।



 

गांव, शहर, प्रदेश व देश का विकास किए जाने के नाम पर चारों ओर सर्वनाश ही सर्वनाश हो रहा है। खेत-खलिहान, जंगल, नदी, तालाब, पर्वत सब कुछ नष्ट किए जा रहे हैं। पर्यावरण का हाल बुरा है, शराब की नदियां बहाई जा रही है, रोज नए बूचड़खाने खुल रहे हैं। विदेशी पशुओं और पक्षियों को भारत में बसाया जा रहा है। आजकल ऑस्ट्रेलियन पक्षी ऑस्ट्रीच के जगह जगह फॉर्म हाउस खुल गए हैं।